img

US Tariffs Impact on Agriculture Exports : प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने बृहस्पतिवार को कहा कि अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए नए टैरिफ के बावजूद, भारत अपने कृषि निर्यात को बनाए रख सकता है, बल्कि संभावित रूप से इसमें इज़ाफा भी कर सकता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भले ही अमेरिका ने भारत पर 26 प्रतिशत ‘रियायती जवाबी शुल्क’ लगाया है, फिर भी भारत की स्थिति अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर है।

भारत के निर्यातकों को मिल सकती है राहत

गुलाटी का मानना है कि भारतीय कृषि उत्पादों पर लगाया गया शुल्क, जैसे समुद्री खाद्य पदार्थ और चावल, इन उत्पादों की अमेरिकी बाजार में मांग और प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम प्रभाव डालेगा। उन्होंने कहा कि हमें इस शुल्क वृद्धि को अलग-थलग करके नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि हमारे प्रतिस्पर्धी देशों को कितने प्रतिशत शुल्क का सामना करना पड़ रहा है।

भारत की तुलना में अन्य देशों पर भारी शुल्क

गुलाटी, जो कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) के पूर्व चेयरमैन हैं, ने स्पष्ट किया कि जहां भारत पर 26 प्रतिशत शुल्क लगाया गया है, वहीं चीन को 34 प्रतिशत का सामना करना पड़ रहा है। इससे भारत को लगभग 8 प्रतिशत का सापेक्ष लाभ मिलता है। इसी तरह, वियतनाम पर 46 प्रतिशत, बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत, थाईलैंड पर 36 प्रतिशत और इंडोनेशिया पर 32 प्रतिशत शुल्क लगाए गए हैं। ऐसे में भारत की स्थिति तुलनात्मक रूप से मजबूत है।

समुद्री खाद्य और चावल निर्यात को नुकसान की आशंका नहीं

गुलाटी ने विशेष रूप से समुद्री खाद्य, खासकर झींगा के निर्यात का ज़िक्र करते हुए कहा कि भारत के लिए यह बाज़ार अभी भी लाभकारी बना रहेगा। झींगा अमेरिकी उपभोक्ता खर्च का बहुत छोटा हिस्सा है, और भारतीय उत्पादों पर तुलनात्मक रूप से कम शुल्क के कारण इसमें मांग में कोई बड़ी गिरावट आने की संभावना नहीं है।

चावल के निर्यात के संबंध में भी गुलाटी ने भरोसा जताया कि भारत, वियतनाम और थाईलैंड जैसे अन्य बड़े निर्यातकों की तुलना में बेहतर स्थिति में है, भले ही अमेरिकी शुल्क वर्तमान में नौ से 11 प्रतिशत से बढ़कर 26 प्रतिशत हो गया हो।

भारत को मिल सकता है नया अवसर

गुलाटी, जो वर्तमान में भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) में कृषि के चेयर प्रोफेसर हैं, ने सुझाव दिया कि भारत को उन बाजारों में अवसर तलाशने चाहिए जिन्हें उच्च शुल्कों के चलते अन्य प्रतिस्पर्धी देश छोड़ रहे हैं। इससे भारत के लिए नए बाजार हिस्सेदारी हासिल करने की संभावना बन सकती है।