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US Tariffs Impact on India : अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर जवाबी शुल्क (रेसिप्रोकल टैरिफ) लगाने की योजना भारत के कई महत्वपूर्ण उद्योगों को प्रभावित कर सकती है। कृषि, औषधि, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और आभूषण जैसे सेक्टर्स को खासतौर पर नुकसान झेलना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के टैरिफ से भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।

क्यों लगाए जा सकते हैं अतिरिक्त शुल्क?

भारत और अमेरिका के बीच आयात शुल्क को लेकर एक बड़ा अंतर है जिसे 'टैरिफ गैप' कहा जाता है। अमेरिका इस अंतर को कम करने के लिए ही जवाबी शुल्क लागू करने की तैयारी कर रहा है। इसका मकसद भारतीय उत्पादों पर उतना ही शुल्क लगाना है, जितना भारत अमेरिकी उत्पादों पर लगाता है।

यह शुल्क अलग-अलग सेक्टर्स के लिए अलग-अलग दरों पर निर्धारित किया गया है। उदाहरण के लिए:

औषधि और रसायन पर 8.6%

प्लास्टिक उत्पादों पर 5.6%

वस्त्र और परिधान पर 1.4%

हीरे, सोना और आभूषण पर 13.3%

मशीनरी और कंप्यूटर पर 5.3%

इलेक्ट्रॉनिक्स पर 7.2%

ऑटोमोबाइल और पार्ट्स पर 23.1%

जितना ज्यादा यह अंतर होगा, उतना ही ज्यादा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ेगा।

कृषि सेक्टर को सबसे बड़ा झटका

कृषि सेक्टर विशेष रूप से इस टैरिफ से प्रभावित हो सकता है, खासकर समुद्री खाद्य पदार्थों का निर्यात। अमेरिका भारत का प्रमुख ग्राहक है, खासतौर पर झींगे (श्रिंप) के लिए। वर्ष 2024 में भारत ने 2.58 अरब डॉलर मूल्य के झींगे अमेरिका को निर्यात किए थे। अब इन पर 27.83% तक टैरिफ लग सकता है। इससे भारतीय झींगे की कीमत बढ़ेगी और भारत की प्रतिस्पर्धा इक्वाडोर और इंडोनेशिया जैसे देशों से कमजोर हो सकती है।

इसके अलावा अन्य खाद्य उत्पाद जैसे प्रोसेस्ड फूड, चीनी और कोको पर 24.99% का टैरिफ अंतर है। फल, सब्जी और मसालों पर भी 5.72% तक का प्रभाव देखा जा सकता है। यह भारतीय किसानों और खाद्य उत्पादकों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन सकता है।

औषधि और हेल्थकेयर सेक्टर पर असर

भारत का फार्मा उद्योग अमेरिकी बाजार में काफी मजबूत है। 2024 में भारत ने अमेरिका को करीब 12.72 अरब डॉलर मूल्य की दवाइयाँ निर्यात की थीं। अब इस सेक्टर पर 10.9% तक का टैरिफ लागू हो सकता है। इससे भारत की जेनेरिक और स्पेशलिटी दवाएं महंगी हो जाएंगी, जिससे अमेरिकी बाजार में इनकी मांग कम हो सकती है। खासतौर पर छोटे और मध्यम स्तर की दवा कंपनियों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।

यह टैरिफ अमेरिका में हेल्थकेयर खर्च को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि भारत की जेनेरिक दवाएं वहां सस्ती और सुलभ विकल्प के रूप में देखी जाती हैं। लेकिन टैरिफ बढ़ने से ये फायदे सीमित हो सकते हैं।

सोना, चांदी और आभूषण उद्योग पर प्रभाव

भारत का आभूषण उद्योग भी अमेरिका पर बहुत हद तक निर्भर है। 2024 में भारत ने इस सेक्टर से 11.88 अरब डॉलर का निर्यात किया था। अब इन पर 13.32% तक का अतिरिक्त शुल्क लग सकता है। इससे भारतीय आभूषण महंगे हो जाएंगे और अमेरिका के बाजार में इनका मुकाबला थाईलैंड, चीन और वियतनाम जैसे देशों से कमजोर पड़ सकता है।

हीरे जड़े आभूषण, कस्टम ज्वेलरी और हेरिटेज डिजाइन वाले उत्पाद जो अमेरिका में काफी लोकप्रिय हैं, वे भी इस नीति से प्रभावित हो सकते हैं। इससे भारत के छोटे ज्वेलरी निर्यातकों की हालत और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को भी नुकसान

भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम और इलेक्ट्रिकल उपकरणों का निर्यात 2024 में 14.39 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। इन पर अब 7.24% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। इसी तरह, मशीनरी, बॉयलर, टर्बाइन और कंप्यूटर जैसे उत्पादों पर भी 5.29% तक का अतिरिक्त शुल्क प्रस्तावित है।

इस टैरिफ से भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमत बढ़ेगी, जिससे अमेरिका में उनकी मांग घट सकती है। यह भारत के 'मेक इन इंडिया' और 'डिजिटल इंडिया' जैसे अभियानों के लिए झटका हो सकता है क्योंकि इनका उद्देश्य भारत को एक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है।

क्या मिल सकती है कोई राहत?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका समान टैरिफ नीति अन्य देशों जैसे इक्वाडोर, थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि पर भी लागू करता है, तो भारतीय निर्यातकों को कुछ हद तक राहत मिल सकती है। लेकिन अगर यह नीति केवल भारत पर ही केंद्रित होती है, तो इसका सीधा असर भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धा पर पड़ेगा।

भारत सरकार इस मुद्दे पर अमेरिका से बातचीत कर रही है। अगर यह टैरिफ लागू होता है, तो भारतीय कंपनियों को नए बाजारों की तलाश करनी पड़ेगी या फिर अपनी उत्पादन लागत घटाकर अमेरिका में प्रतिस्पर्धा बनाए रखनी होगी।